16 नवम्बर अंतर्राष्ट्रीय सहनशीलता दिवस विशेष: सहनशीलता आज के मानव जीवन के लिए बुनियादी आवश्यकता

सहनशीलता :एक महान गुण

अच्छे व्यक्तित्व के  लिए जिन तत्वों की आवश्यकता होती है, उनमें सहनशीलता भी एक है। सहनशीलता एक महान गुण है, जो हमें देवत्व की ओर ले जाता है। बड़े-बुजुर्गों की वाणी, अबोध बालकों की बोली या मानसिक रूप से विकलांग लोगों के शब्द कर्णप्रिय न हों, तब भी सहने की प्रवृत्ति रखनी चाहिए। सहनशील रहकर हम शांत रहते हुए अपने को पहचान पाते है और सफलतापूर्वक अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होते है.  सहनशील व्यक्ति अपने आसपास के वातावरण में शांति और सौहार्द्र कायम रखता है। यह हमारे जीवन के सकारात्मक पहलुओं को उजागर करता है। ऐसे लोग हर स्वभाव के लोगों के साथ तालमेल रखते हैं।

सहनशीलता दिवस क्यों?

आधुनिक युग में रिश्तों में दरार उत्पन्न होने और हिंसा में वृद्धि होने के कारकों में सहनशीलता का अभाव ही है। आज की शिक्षा व्यावसायिक होने के साथ केवल किताबी अध्ययन बनकर रह गई है।जीवन में सहनशीलता का के लाभ को देखते हुए यूनेस्को ने सन १९९५ से 16 नवम्बर को विश्व भर में सहनशीलता दिवस मनाने का फैसला किया।

यूनेस्को-मदनजीत सिंह पुरस्कार(सहिष्णुता और अहिंसा के प्रचार के लिए )

1995 में, यूनेस्को ने सहिष्णुता और अहिंसा के प्रचार के लिए एक पुरस्कार बनाया। यह सहिष्णुता के लिए संयुक्त राष्ट्र वर्ष और महात्मा गांधी के जन्म की 125 वीं वर्षगांठ के अवसर पर बनाया गया। सहिष्णुता और अहिंसा के प्रचार के लिए यूनेस्को-मदनजीत सिंह पुरस्कार से पुरस्कृत करता है। जिसका उद्देश्य सहिष्णुता और अहिंसा की भावना को बढ़ावा देना है।

यह पुरस्कार 16 नवंबर को अंतर्राष्ट्रीय दिवस पर सहिष्णुता के लिए हर दो साल में प्रदान किया जाता है। पुरस्कार संस्थानों, संगठनों या व्यक्तियों को दिया जा सकता है। जिन्होंने सहिष्णुता और अहिंसा के लिए विशेष रूप से सराहनीय और प्रभावी तरीके से योगदान दिया है।

सहनशीलता: एक आवश्यकता

जीवन के संस्कार वही दे सकता है, जो स्वयं संस्कारी हो। उनमें अपने बुजुर्गों और पड़ोसियों को आदर देने की क्षमता हो। प्राय: देखा जाता है कि जिन्हें हम चाहते हैं, उनके कुकर्म या कठोर वाणी को भी सह जाते हैं। जबकि जिनके साथ संबंध अच्छा नहीं होता, उनकी अच्छी वाणी भी बुरी प्रतीत होती है। इन्हीं जगहों पर सहनशीलता की आवश्यकता है । यही हमारे आदर्श चरित्र को गढ़ने में सहायक होता है। आज पूरी दुनिया असहनशीलता की वजह से अंगार के ढेर पर बैठी हुई है। आतंकवादी हमलों की वजह से जानमाल की बर्बादी हो रही है.

सहनशीलता: एक अभ्यास

सत्कर्म के लिए आत्म नियंत्रण और सहनशीलता बेहद आवश्यक है। पुराने समय में ऋषि-मुनि नंगे बदन तपस्या में लीन रहते थे, ताकि वे मौसम के कठोर प्रहार को सह सकें। भीषण गरमी में देह को तपाकर वे अपनी सहनशीलता की परीक्षा देते थे। इसलिए सहिष्णुता का अभ्यास करना चाहिए। किसी के दोषों को देखकर उन पर टीका-टिप्पणी करने के पहले अपने बड़े-बड़े दोषों का अन्वेषण करना चाहिए।

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