बी. पी. के जीवन तथा स्काउटिंग गाइडिंग की प्रमुख घटनाएं

स्काउट का शाब्दिक अर्थ

‘स्काउट’ का शाब्दिक अर्थ है- गुप्तचर, भेदिया, जासूस। फौज में जो चुस्त, चालाक, साहसी हो, रास्ता बनाने, नदी-नालों पर पुल बनाने, संकेतों द्वारा संवाद भेजने, घायलों की प्राथमिक चिकित्सा करने तथा शत्रु की गतिविधियों का पता अपने अधिकारियों को देने का काम करते हैं उन्हें ‘स्काउट’ कहा जाता है।

टीचर्स कालेज, कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयार्क के प्रोफेसर जेम्स ई. रसल ने लिखा है-

“The Programme of boy scouts is the man’s job cut down to boy’s size. It appeals to the boy not merely because he is a boy, but because he is a man in making.

टीचर्स कालेज, कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयार्क के प्रोफेसर जेम्स ई. रसल

लार्ड बेडन पावेल ने फौजी स्काउट को बालोपयोगी स्वरूप प्रदान कर उनका चरित्र – निर्माण और व्यक्तित्व का विकास करने वाली संस्था बनाया, ताकि वे एक सुयोग्य नागरिक बन सकें। इसलिये बी. पी. को स्काउटिंग का जनक कहा गया है। उनके जीवन का अध्ययन स्काउट आन्दोलन की पृष्ठभूमि है। भारत और अफ्रीका उनकी कर्मस्थली थे। अतः स्काउटिंग में यहां के अनुभवों का समावेश होना स्वाभाविक है। उन्होंने स्काउट-भावना को जिस अर्थ में प्रतिबिंबित किया है, उसकी झलक प्राचीन भारतीय जनमानस में सर्वत्र व्याप्त थी। वर्तमान स्काउट/गाइड शिविर प्राचीन भारतीय शिक्षार्थियों का ही एक रूप था जो जंगलों में प्रकृति के सानिध्य में अवस्थित गुरु-आश्रमों में रहकर प्राकृतिक व स्वयं-सेवी जीवन-यापन कर शिक्षा ग्रहण करते थे। हमारे ऋषि मनीषी-तपस्वी जीवन पर्यन्त वनोपसेवन करते रहे। प्रकृति की सुरम्य गोद में सादगी का जीवन यापन कर चिन्तन, मनन, अध्ययन व साहित्य- रचना कर आत्मोन्नति हेतु तल्लीन रहे। वेद, पुराण, उपनिषद, ऋचाएं, महाकाव्य आदि की रचना इन्हीं शान्त, सुरम्य-नैसर्गिक सुषमा स्थलों पर हुई।

बी. पी. ने भारतीय गाँवों की चौपालों में अलाव के चारों ओर बैठे लोगों को किसी वृद्ध व्यक्ति को किस्से, कहानी, जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव सुनाते देखकर स्काउटिंग में कैम्प फायर’ का विचार ग्रहण किया। दक्षिण अफ्रीका और भारत के अनुभवों को एड्स टू स्काउटिंग’ नामक पुस्तक का स्वरूप दिया।

बी. पी. का जन्म

बी. पी. का जन्म 22 फरवरी, 1857 को स्टेनहॉल स्ट्रीट, लैंकेस्टर गेट लन्दन जिसे अब स्टेनपोल टेरेस लन्दन प.2 कहा जाता है, में रेवरेन्ड प्राध्यापक हर्बर्ट जार्ज बेडन पॉवेल के घर हुआ। वे आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में रेखागणित के प्राध्यापक थे जो आस्तिक, सादगी प्रिय तथा प्रकृति प्रेमी व्यक्ति थे। उनकी माता हेनरिटा ग्रेस स्मिथ ब्रिटिश एडमिरल की पुत्री थी जो स्नेहमयी कर्मठ, विदुषी महिला थी। बी. पी. की शिक्षा चार्टर हाउस स्कूल (Charter House School) में हुई। चार्टर हाउस में वे 1870 में छात्रवृत्ति लेकर प्रविष्ट हुए। जहां उन्हें ‘बेदिंग टावल’ के नाम से पुकारा जाता था, ये इस स्कूल में एक प्रसिद्ध फुटबॉल ‘गोलकीपर रहे। वे एक अच्छे नायक, नाटककार तथा कलाकार थे। 1876 में सेना अधिकारियों की भर्ती प्रतियोगिता में 700 अभ्यर्थियों में से कैवलरी में दूसरे और इनफैट्री में चौथे स्थान पर उत्तीर्ण हुए। अतः उन्हें प्रशिक्षण से मुक्त कर 13वीं हुसार्स रेजीमेन्ट, लखनऊ (भारत) में सब लेफ्टीनेन्ट पद पर नियुक्ति मिली। सन् 1883 में 26 वर्ष की अवस्था में वे कैप्टन हो गये। घुड़सवारी, सुअर का शिकार करना, स्काउटिंग तथा थियेटरों में भाग लेना उनके प्रमुख शौक थे।

बी. पी. को स्काउटिंग की प्रेरणा

बी. पी. को स्काउटिंग की प्रेरणा 1899-1900 में दक्षिण अफ्रीका की एक घटना से प्राप्त हुई। दक्षिण अफ्रीका में मेफकिंग (Mafeking) सामरिक महत्व का एक महत्वपूर्ण कस्बा था जहां 1500 गोरे और 8000 स्थानीय लोग रहते थे, हॉलैन्ड निवासी डच लोग जिन्हें यहां बोअर (Boers) के नाम से पुकारा जाता था, इस महत्वपूर्ण कस्बे को अपने अधीन लेना चाहते थे। “Who holds Mafeking, hold the regins of South Africa.” की कहावत वहां प्रचलित थी। बोअरों की 9000 सेना ने मेफकिंग को घेर लिया। बी. पी. के पास अंग्रेजी सेना में कुल मिलाकर 1000 सैनिक थे जिनके पास मात्र 8 बन्दूकें और थोड़ा-सा डाइनामाइट था। अपनी युक्ति से बी. पी. ने 217 दिन तक बोअरों को कस्बे में घुसने नहीं दिया। 17 मई, 1900 को इंग्लैण्ड से सैनिक सहायता प्राप्त होने के पश्चात बी. पी. ने बोअरों पर विजय प्राप्त की। इस विजय का पूर्ण श्रेय बी. पी. को जाता है।

इस विजय की एक प्रमुख घटना यह रही थी कि बी. पी. के स्टाफ ऑफिसर लाई एडवर्ड सिसिल ने मेफकिंग के 9 वर्ष से अधिक उम्र के लड़कों को इकट्ठा कर एक ‘कैडेट कॉस’ (Cadet Corps) या बाल-सेना तैयार की जिन्हें प्रशिक्षित कर और वर्दी पहनाकर संदेश वाहक, अर्दली, प्राथमिक चिकित्सा आदि कार्यों में लगा दिया तथा उनके स्थान पर लगे सनिकों को सीमा पर लड़ने के लिये मुक्त कर दिया। ‘गुड ईयर’ (Good Year) नामक सार्जेन्ट मेजर के नेतृत्व में इन लड़कों का कार्य अद्वितीय रहा। इनका साहस, चुस्ती, फुर्ती देखते ही बनते थे। लार्ड सिसिल के इस प्रयोग ने बी. पी. को प्रभावित किया। इस घटना से प्रेरित होकर उन्होंने “एड्स टू स्काउटिंग” (Aids to Scouting) नामक पुस्तक लिखी जो शीघ्र ही इंग्लैण्ड के विद्यालयों में पढ़ाई जाने लगी। इस पुस्तक से प्रभावित होकर मि. स्मिथ ने बी. पी. से लड़कों के लिये स्काउटिंग की एक योजना बनाने का आग्रह किया। परिणाम स्वरूप 1907 में इंग्लिश चैनल (ब्रिटेन की खाड़ी) में पूल हार्बर के निकट ब्राउनसी द्वीप में 29 जुलाई से 9 अगस्त तक समाज के विभिन्न वर्गो, विद्यालयों के 20 लड़कों का प्रथम स्काउट शिविर स्वयं बी. पी. ने आयोजित किया। इस प्रयोगात्मक शिविर के अनुभवों को उन्होंने ‘स्काउटिंग फॉर बॉयज’ (Scouting for Boys) नामक अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में लिपिबद्ध कर दिया। इस पुस्तक के 26 कथानक (Camp Fire Yarns) बी. पी. द्वारा शिविर तथा कैम्पफायर में कहीं गई बातें तथा कहानियां हैं जिन्हें छ: पाक्षिक संस्करणों में जनवरी, 1908 से अप्रैल, 1908 तक प्रकाशित किया गया।

बी. पी. के जीवन तथा स्काउटिंग गाइडिंग की प्रमुख घटनाएं

बी. पी. के जीवन तथा स्काउटिंग गाइडिंग की प्रमुख घटनाएं तथा प्रमुख तिथियाँ निम्नाकिंत थी :-

1908- स्काउटिंग फॉर बॉयज नामक पुस्तक का प्रकाशन हुआ।
1909- क्रिस्टल पैलेस लन्दन की स्काउट रैली में 11000 स्काउट्स ने भाग लिया, वुल्फ पैट्रोल की कुछ लड़कियां भी स्काउट हैट व स्कार्फ पहनकर इस रैली में आ धमकी।
1910- बी. पी. की बहन मिस एग्नेस बेडन पावेल की सहायता से बी. पी. ने गर्ल गाइडिंग प्रारम्भ की।
1911- विन्डसर पैलेस में दूसरी स्काउट रैली में 30,000 स्काउट्स ने जार्ज पंचम को सलामी दी।
1912-बी. पी. ने मिस ओलेव सेन्ट क्लेयर सोम्स से शादी की।
1911- प्रथम विश्व युद्ध 1914 से 1918 तक स्काउट्स ने सहायता कार्य किया।

5 अगस्त, 1914 से 7 मार्च, 1920 तक कुल 23,000 स्काउट्स ने चिकित्सालयों एवं तट-रक्षा में सहायता की।
1916- बुल्फ कब संस्था खोली तथा वुल्फ कब हैण्डबुक लिखी।
1919- ‘एड्स टू स्काउट मास्टरशिप’ पुस्तक लिखी। गिलवेल पार्क की भूमि प्राप्त की। स्काउटर्स उच्च प्रशिक्षण केन्द्र बना। रोवरिंग प्रारम्भ हुई।
1920-ऑलम्पिया, लन्दन में पहली विश्व स्काउट जम्बूरी हुई जिसमें 34 देशों के 8000 स्काउट्स ने भाग लिया। भारत से 15 स्काउट तथा 8 कब सम्मिलित हुए। 6 अगस्त, 1920 को बी. पी. को विश्व चीफ स्काउट घोषित किया गया।
1921-बी. पी. का भारत आगमन हुआ।
1922- “रोवरिंग टू सक्सेस” नामक पुस्तक का प्रकाशन हुआ।
1924- दूसरी विश्व जम्बूरी डेनमार्क में कोपनहेगन के निकट अरमेलुन्डेन (Ermelunden) में सम्पन्न हुई जिसमें 33 देशों के 4549 स्काउट्स ने भाग लिया।
1929- तीसरी विश्व जम्बूरी ऐरोपार्क, बिर्केनहैड, इंग्लैंड में हुई। 69 देशों के 50,000 स्काउट्स ने भाग लिया।
1930-लेडी बी. पी. विश्व चीफ गाइड बनी।
1933- चौथी विश्व जम्बूरी हंगरी के गोडोलो में हुई जिसमें 54 देशों के लगभग 25,000 स्काउट्स सम्मिलित हुए।
1997- बी. पी. तथा लेडी बी. पी. का पुनः भारत आगमन हुआ। दिल्ली में अखिल भारतीय जम्बूरी आयोजित हुई। हॉलैण्ड में पाँचवी विश्व जम्बूरी हुई जिसमें 34 देशों के 28,750 स्काउट्स ने भाग लिया।
1941-8 जनवरी, 1941 को केन्या में लम्बी बीमारी के बाद 83 वर्ष 10 माह 17 दिन का शानदार जीवन जी कर बी. पी. स्वर्गवासी हुए। माउन्ट केन्या (अफ्रीका) में उनको दफनाया गया।

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