स्काउट कृत्रिम श्वसन (CPR =Cardio-Pulmonary Resuscitation) कैसे दें

कृत्रिम श्वसन (CPR =Cardio-Pulmonary Resuscitation)

इस प्रक्रिया में मुंह से मुंह द्वारा कृत्रिम श्वास देकर (मस्तिष्क और हृदय में रक्त का प्रवाह बना रहे) श्वास को कृत्रिम रूप से फेफड़ों में भरा जाता है ताकि रक्त में ऑक्सीजन पहुँच सके। यह प्रक्रिया उन लोगों पर अपनाई जाती है जिनकी श्वास रुकी हो अथवा अव्यवस्थित श्वास चल रही हो।

इस विधि का मूल उद्देश्य है, हृदय को रुकने से बचाना, ऑक्सीजन युक्त रक्त को हृदय और मस्तिष्क में पहुंचाना । कोशिकाओं और तन्तुओं के समूह के मृत होने और मस्तिष्क के मृत होने को बचाना

प्राथमिक सहायक का प्रथम काव्य यह है कि सबसे पहले वह आवश्यकतानुसार हवा द्वारा फेफड़ों को फुलाये। उसके हाथ, मुंह और फेफड़े ही हृदयको उसके मुख्य उपकरण हैं। इस प्रक्रिया के लिय उसे प्रशिक्षित होना आवश्यक है। एक प्रशिक्षित प्राथमिक सहायक दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति के फेफड़ों में वायु भरने के साथ-साथ उसके वायु मार्ग को खोलने के लिये उसके सिर और निचले जबड़े को भी उपयुक्त स्थिति में ले जाकर कार्यवाही करने में सक्षम होता है।

यदि मुंह दर मुंह अथवा मुंह दर नाक द्वारा सांस देने की विधि से सफलता न मिले तो वाह्य हृदय पुनर्सलन प्रक्रिया अपनानी चाहिए। इस प्रक्रिया में दो व्यक्तियों की आवश्यकता होती है- एक मुंह-द्वारा-मुंह से सांस दे और दूसरा व्यक्ति पुनः चालू करने की प्रक्रिया करें।

मुंह से मुंह में सांस देने की विधि में रोगी को चित्त लिटाकर और उसके सिरहाने बैठकर या लेटकर अपने मुंह में ऑक्सीजन (सांस) भर कर उसे रोगी के मुंह में फूंक दिया जाता है। रोगी की नाक उस समय हाथ की अंगुलियों से बंद कर ली जाती हैं। 5 सेकण्ड या 3 सेकण्ड की गति से यह प्रक्रिया की जाती है। हर बार अपने मुंह में नई सांस भर कर रोगी के मुंह में फूक दी जाती है। यदि रोगी के मुंह के द्वारा सांस देना संभव न हो तो नाक से दी जानी चाहिए।

होल्गर-नैल्सन विधि (Holdger & Nielsen Method or Arm liftback pressure)-

रोगी को पट लिटा दें, उसके दोनों हाथों को कुहनी से मोड़कर एक दूसरे के निकट रखें तथा उनके ऊपर औंधा मुंह कर रोगी को लिटा दें। प्राथमिक चिकित्सक रोगी के सिर की ओर इस प्रकार बैठे कि एक घुटना भूमि पर लगा हो। दोनों हाथों के अंगूठे रीढ़ खम्भ के ऊपर समानान्तर स्थिति में हों तथा शेष अंगुलियों फैली रहें। हाथ रोगी के शरीर के ऊपर सीधे तने हों। एक-दो की गिनती के साथ अपना शरीर आगे को झुकाकर रोगी की पसलियों पर दबाव डालें । तीन की गिनती पर पूर्वावस्था में आ जायें। चार-पाँच की गिनती पर रोगी की भुजाओं को कुहनी के को एक मिनट में 10 (दस) बार एक विशेष लय से अपनाते रहे । जब रोगी की सांस चलने लगे तो बाद का क्रम चार-पाँच व छ: को ही अपनाएं।
Hiplift backpressure
रोगी को औधे मुंह (पट) लिटा कर मुंह को ठीक हाथ पर टिका दें। प्राथमिक चिकित्सक रोगी के कुल्हे (Hip) के पास इस प्रकार कि एक पैर का घुटना एक कुल्हे के बगल तथा दूसरा उसके दूसरे कुल्हे के पास रखें। निचली पसलियों पर दोनों हाथ इस प्रकार रखें कि दोनों अंगूठे समानान्तर रहे। एक-दो-तीन की गिनती के साथ अपने कुल्हे उठाकर रोगी पर दबाव डालें और चार की गिनती के साथ पूर्ववत आ जायें । पाँच-छः सात की गिनती पर हाथों को कन्चे की ओर सरकाकर अपने शरीर का पूरा दबाव डाल दें और आठ की गिनती के साथ पूर्ववत् आ जाये। यह प्रक्रिया लयात्मक विधि से एक मिनट में 10 (दस) बार अपनाए।

सिल्वैस्टर्स विधि –

रोगी को चित लिटा दें। कन्धों के नीचे तौलिया या कम्बल रखें। सिर कुछ नीचे मुंह ऊपर को रहे। प्राथमिक चिकित्सक को रोगी के सिर के पास दोनों घुटने टिकाकर बैठना चाहिए। रोगी की दोनों कलाइयाँ उसके हाथों को सीने पर क्रास करें। अब आगे झुककर रोगी की पसलियों पर दबाव डालें। इससे रोगी के अन्दर की वायु बाहर निकल जायेगी। इसी लय में शरीर का भार पूर्ववत लाकर रोगी के हाथों को बाहर की ओर फैलाते हुए भूमि तक ले जायें। 2 सेकण्ड तक दबाव (Push) 3 सेकण्ड तक फैलाव (Pull) इस प्रकार 5 सेकण्ड में एक प्रक्रिया करते हुए प्रति मिनट 12 बार इस क्रम को करते रहें।
सिल्वैस्टर्स विधि तब अपनाई जाती है जब उसे पट लिटाना सम्भव हो सके।

सेफर्स विधि -रोगी को पट लिटा दें, हाथों की कुहनी से मोड़कर एक दूसरे पर क्रॉस कर दें। मुंह हाथों के ऊपर रखकर एक ओर घुमा दें।

प्राथमिक चिकित्सक रोगी के कुल्हे के एक ओर दोनों घुटने टेक कर बैठ जाये तथा रोगी की पीठ पर हाथों को इस प्रकार रखें कि दोनों अंगूठे अन्दर की ओर तथा शेष अंगुलियां बाहर की ओर रहें। अपने शरीर के दबाव से रोगी की पसलियों को दबायें तथा ढील देकर पूर्वावस्था में आ जायें। यह क्रम एक मिनट में 12 बार अपनाएं।

अंगूठे कूल्हे के किनारे से थोड़ा ऊपर परतु हटकर मुडी हों और अंगुलियों के सिरे भूमि की ओर हों। अपनी कोहनियों की बिलकुल सीधा रखें।

गति (1)

बिना अपनी कोहनियों को मोड़े हुए धीरे से अपने घुटनों को खोलते हुए आगे को होइए और अपने जाँधों (Thigh) को सीधा कर दीजिए। कंधों को हाथों की बिलकुल सीध में उनके ऊपर ही ले आइए और इस प्रकार अपने शरीर का बोझ पायल की कमर पर डाल दें। इससे पेट के भीतरी अंग भूमि के साथ दब जाते हैं। तथा मांसशिरा (Diaphragm) को ऊपर धकेल देते हैं। इससे फेफड़ों से वायु बाहर धकेल दी जाती है। अर्थात् उच्छ्वास हो जाता है। गति (1) में कार्य कर्ता को केवल अपने शरीर का ही बोझ डालकर दबाना चाहिए ना कि पुट्ठों का बल लगाकर । बोझ का दवाब 60 पौण्ड से अधिक नहीं बढ़ना चाहिए। इसका अभ्यास होलगर नीलसन विधि में बताई गई तौलने वाली मशीन से कीजिए।

गति (2)

दबाव हटाने के लिए अब अपने शरीर को धीरे से वापिस अपनी ऐडियां पर ले आइए। इससे पेट के भीतरी अंग पुनः अपने स्थान पर आ जाते हैं और मांसशिरा नीचे हो जाती है जिससे श्वास अंदर खींची जाती है।

सुर-ताल

दो गतियां जो अधिक कोमलता तथा एक सुर-ताल में होनी चाहिए। 5 सेकण्ड लेती हैं। (अर्थात् एक मिनट में 12 बार)। गति 1 को दो सेकण्ड तथा गति 2 को तीन सेकण्ड लगने चाहिए

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