स्वास्थ्य के सामान्य नियम

स्वास्थ्य के सामान्य नियम

चरक ने कहा है-

‘शरीर माध्यम खलु धर्म साधनम्’

अर्थात् धर्म के मार्ग पर चलने का सबसे पहला साधन शरीर है। अंग्रेजी में भी कहा गया है

‘A Healthy mind lives in a healthy body’

अर्थात् स्वस्थ तन होगा तो स्वस्थ मन रहेगा। स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए निम्नलिखित बातों की जानकारी होना, उन पर अमल करना और सतत् अभ्यास करना आवश्यक है:-

स्वच्छता (Cleanliness) –

अंग्रेजी में एक कहावत है

‘Cleanliness is next to godliness’

अर्थात् स्वच्छता एक ईश्वरीय कार्य है। अपनी स्वच्छता रखना प्रत्येक व्यक्ति का प्रथम कर्तव्य है किन्तु, दूसरों की स्वच्छता का ध्यान रखना एक अच्छी नागरिकता है। स्वस्थ व्यक्ति अपने लिये, अपने परिवार, पड़ोस, समाज तथा राष्ट्र के लिए सुख का आधार है। अच्छा स्वास्थ्य लेकर जन्म लेना एक बात है किन्तु, यदि उसे सुरक्षित रखने के नियम न आते हों और उनका पालन न किया जाये तो वह सब व्यर्थ हो जाता है। स्वच्छता देवताओं को प्रिय है। हमारे धर्म-कर्म में भी स्वच्छता के अंतर्गत शारीरिक, मानसिक तथा आसपास की स्वच्छता सम्मिलित है।

शारीरिक स्वच्छता-

शरीर को स्वच्छ रखने के लिये प्रतिदिन स्नान करना अत्यावश्यक है। यदि प्रतिदिन स्नान करना सम्भव न हो तो स्वच्छ तौलिये को भिगोकर शरीर को रगड़ लेना चाहिए ताकि रोम छिद्र खुल जायें। रोम छिद्रों से पसीने के द्वारा शरीर का विकार बाहर निकलता है जिन्हें, स्वच्छ रखना अति आवश्यक है। शरीर के प्रत्येक अंग की स्वच्छता का ध्यान रखा जाना चाहिए। आँख, कान, नाक, जिव्हा, दाँत, गला आदि की भी स्वच्छता अत्यावश्यक है। बालों में प्रतिदिन कथा करना, नाखून कटे व साफ रखना, दांतों की सफाई सोने से पूर्व तथा प्रातः नाश्ता करने के बाद कर ली जानी चाहिए। रात्रि में सोने से पूर्व यदि गुनगुने पानी में थोड़ा नमक मिलाकर गरारे कर लें तो गला साफ रहता है। शरीर की भीतरी स्वच्छता के लिए पर्याप्त पानी पीना तथा आदतों को नियंत्रित और नियमित रखना आवश्यक है।

मानसिक स्वच्छता –

शरीर की स्वच्छता का प्रभाव मन पर तथा मन की स्वच्छता का शरीर पर पड़ता है। अतः स्वस्थ रहने के लिये मानसिक भोजन भी उतना ही आवश्यक है, जितना शारीरिक भोजन। अच्छी पुस्तकों का अध्ययन, अच्छे मित्रों व दृश्यों का दर्शन तथा खाली समय में मन में अच्छे विचार लाना तथा सत्संग करना मानसिक स्वास्थ्य के लिये परमावश्यक है। माता-पिता और बड़ों द्वारा बच्चों को ऐसी पुस्तकें पढ़ने को दी जानी चाहिए जिससे उनका ज्ञानवर्धन हो। वीरता, करुणा, प्रेम, सहयोग, बड़ों का सम्मान और संवेगों का विकास हो सके। महान् विभूतियों की जीवनी, उत्तम कहानियाँ, ज्ञानवर्धक पत्रिकाएँ उन्हें पढ़ने को दी जानी चाहिए। अश्लील, कामोत्तेजक पुस्तकों को नहीं पढ़ना चाहिए।

आस-पास की स्वच्छता –

आसपास की स्वच्छता भी अति आवश्यक है। घर के आस-पास धूल, जाले, गन्दगी, मक्खी, मच्छर आदि न हों। रोशनी और प्रकाश की पर्याप्त व्यवस्था हो। कूड़ा-करकट को किसी गढ्ढे में भर कर कम्पोस्ट खाद बनाई जा सकती है। यदि कहीं पर गन्दे पानी के पोखर-तालाब हों तो उन्हें मिट्टी से पाट देना चाहिए ताकि मच्छर न पल सकें। मच्छरों को मारने के लिए पोखर-तालाबों में मिट्टी के तेल तथा आसपास डी. डी. टी. छिड़क देनी चाहिए। वस्त्रों की स्वच्छता- वस्त्र व्यक्तित्व को निखारते हैं। अतः वे स्वच्छ, सही सिले, बटन लगे तथा प्रेस किये हों। मौसम के अनुसार हों। अत्यंत भड़कीले, फटे, गन्दे कपड़े न पहने जायें। वस्त्रों से भी किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को आंका जा सकता है। शरीर को स्पर्श करने वाले भीतरी वस्त्रों-कच्छा, बनियान, मौजे आदि को प्रतिदिन धोना चाहिए।

बी. पी. सिक्स व्यायाम-

आधुनिक युग भौतिक युग है जहां मनुष्य माँस- पेशियों का काम मशीन से ले रहा है। थोड़ी दूर चलना हो तो वाहन का प्रयोग करना, बिजली के उपकरणों से अधिक से अधिक काम लेना-यहां तक कि कपड़े धोने में जो परिश्रम करना पड़ता था वह भी अब ‘वाशिंग मशीन’ कर रही है। परिणामस्वरूप व्यक्ति को जीने के लिये डॉक्टरों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। शहरी क्षेत्रों में यह स्थिति अधिक भयावह है। गाँवों में लोग कृषि तथा पशु पालन के कार्यों में व्यस्त रहते हैं जिससे वे शहरी की अपेक्षा अधिक हृष्ट-पुष्ट तथा स्वस्थ रहते हैं।

शहर के व्यक्तियों के लिए स्वस्थ रहने हेतु एक ही उपाय है- प्रति दिन नियमित रूप से व्यायाम आसन करना।

व्यायाम से शरीर स्वस्थ व सुडौल होता है, चेहरे पर आभा, मन प्रसन्न, भोजन का ठीक प्रकार पच जाना तथा दूसरों की सहायता व रक्षा करने की क्षमता का विकास होता है। प्रातः टहलना, कोई खेल खेलना, तैरना, घुड़सवारी करना, बाक्सिंग, कुश्ती आदि भी व्यायाम के ही अंग हैं, इन्हें नियमित रूप से करने से रक्त-परिसंचरण सुचारु रहता है। जोड़ों में विकार नहीं होता, माँस-पेशियां सबल रहती हैं और, किसी भी कार्य को करने के लिये व्यक्ति में जीवटता आ जाती है। एक अंग्रेज विद्वान ड्राइडन (Dryden) ने कहा है कि-

“lts is better to turst fresh air and exercise than to pay doctors bill to keep yourself healthy.”

ड्राइडन (Dryden)

स्वास्थ्य के बारे में लाई बेडेन पावेल ने कहा है कि, प्रत्येक स्काउट/गाइड को निम्नलिखित छः कार्य करने चाहिए:-

1. हृदय को मजबूत बनाओ ताकि, वह मजबूती से शरीर के सभी अवयवों में रक्त प्रवाहित कर सके।

2. फेफड़े मजबूत करो ताकि, गहरी साँस लेकर शुद्ध आक्सीजन से शुद्ध रक्त बनता रहे।

3. पसीना बहाओ ताकि शरीर की गंदगी बाहर आ सके।

4. पेट को क्रियाशील बनाओ ताकि पाचन शक्ति बनी रहे। मल विसर्जन अवयवों को सक्रिय व शुद्ध रखो।

5. शरीर की सभी माँस-पेशियों को क्रियाशील बनाओ ताकि रक्त का संचार ठीक बना रहे।

बी. पी. ने स्वस्थ और सुखी जीवन यापन के बारे में कहा है-

“स्वस्थ और प्रसन्नचित रहने के लिये रक्त शुद्ध और सक्रिय रखो जो सादे संतुलित भोजन, पर्याप्त व्यायाम, स्वच्छ हवा, शरीर की आन्तरिक और बाह्य स्वच्छता तथा समुचित विश्राम से ही सम्भव है।”

बी. पी. के द्वारा निर्धारित छः व्यायाम इस लक्ष्यपूर्ति हेतु सहायक है। इन्हें प्रति दिन 10 मिनट तक किया जाय तो अवश्य लाभ होता है। इन्हें करते समय शरीर और सांस का सामंजस्य आवश्यक है। जब शरीर नीचे झुके तो साँस छोड़ी जाय और ऊपर को उठे तो साँस ली जाय, साँस नाक से लेकर मुंह से छोड़ी जा सकती है। व्यायाम को बायीं और दाहिनी तरफ से करना चाहिए। व्यायाम को कम से कम 6 बार तथा अधिकतम 12 बार करना चाहिए। स्काउट/गाइड जब इन्हें एक साथ करें तो अपनी क्षमता व समय के अनुसार करें।

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