उच्च प्राथमिक स्तर पर संस्कृत सीखने के प्रतिफल

0

उच्च प्राथमिक स्तर पर संस्कृत सीखने के प्रतिफल


संस्कृत विश्व की प्राचीनतम भाषा है। यह भाषा राष्ट्रीय एकता, अखण्डता, नैतिकता एवं आध्यात्मिक महत्व को प्रतिपादित करती है। भारतीय संस्कृति के संवर्धन एवं संरक्षण हेतु संस्कृत भाषा का ज्ञान परम आवश्यक है। वैदिक वाङ्मय से आज पर्यन्त साहित्य में अनेक विधाओं पर रचना हो रही है। संस्कृत भाषा अपनी प्राञ्जलता एवं सलोनी शैली से अन्य भाषा को सम्पुष्ट ही नहीं करती प्रत्युत ललाम बन जाती है। अतः विद्यालयीन शिक्षा के पाठ्यक्रम में संस्कृत भाषा का ज्ञान छात्रों के लिए अपरिहार्य है।

1. संस्कृत शिक्षण के सामान्य उद्देश्य:-

  • संस्कृत भाषा का सामान्य ज्ञान कराना।
  • संस्कृत भाषा को समझने, बोलने, पढ़ने व लिखने की क्षमता विकसित करना।
  • संस्कृत भाषा के प्रति अनुराग पैदा करना।

2. संस्कृत शिक्षण के विशिष्ट उद्देश्यः-

  • छात्रों के में संस्कृत की ध्वनियों का शुद्ध उच्चारण करने की योग्यता का विकास करना।
  • अर्थबोध के साथ संस्कृत बोलने, लिखने व पढ़ने की क्षमता विकसित करना।
  • सरल श्लोकों को कण्ठस्थ कर सस्वर वाचन करने की योग्यता का विकास करना।
  • सामाजिक सांस्कृतिक व नैतिक मूल्यों का विकास करना।
  • संस्कृत भाषा के माध्यम से छात्रों में भारतीय वैज्ञानिक खोज व अनुसंधान के प्रति रूझान पैदा करना।

विषयवस्तुओं का बोध:-

  • हस्व एवं दीर्घ स्वर का उच्चारण करना।
  • वर्णों के उच्चारण स्थान का ज्ञान। यथा स्वरो में अ, आ, इ, ई आदि स्पर्श वर्ण,अन्त अन्तःस्थ वर्ण एवं उष्मवर्ण का ज्ञान होना।
  • संयुक्ताक्षर वर्ण का ज्ञान यथा क्षत्र ज्ञ।
  • शप सवर्णों का उच्चारण अभ्यास।
  • अनुस्वार का यथा स्थान प्रयोग।
  • रेफयुक्त शब्दों का ज्ञान – रेफ कब वर्ण के नीचे लगता है, और कब वर्ण के ऊपर लगता है।
  • यथा – प्रदीपः भ्रमः क्रिया, कृष्णः । यथा कर्म धर्म: चर्मः।
  • यदि र के बाद व्यञ्जन वर्ण हो तो वह ‘र’ अपने आगे वाले वर्ण के ऊपर लगता है, यदि ‘र’ के बाद स्वर हो तो अपने पूर्व वर्ण के नीचे लग जाता है।
  • . ‘परः सन्निकर्षः सहिता संधिः’ संधि के प्रकारों में स्वर व्यञ्जन व विसर्गो का ज्ञान।
  1. रमा + ईश- रमेशः
  2. वाक् + हरिः-वाग्घरिः
  3. मुनिः + आगतः – मुनिरागतः

• समसन इति समासः, अव्ययीभाव, तत्पुरुष, कर्मधारय, द्वंद, द्विगु व बहुव्रीहि आदि समासों का सोदाहरण बोध कराना।

• क्रियान्वयित्वं कारकत्वम्, कर्त्ता, कर्म, करण सम्प्रदान, अपादान, संबंध, अधिकरण एवं संबोधन कारक का सम्यक बोध कराना।

• जिसका रूप अपरिवर्तित है वह अव्यय है। स्थानवाचक, कालवाचक, प्रकारवाचक, समुच्चयवाचक, संबंधवाचक, परिमाणवाचक, निषेधवाचक, स्वीकृतिवाचक तथा आश्चर्य वाचक अव्ययों का उदाहरण सहित बोध कराना।

• कृत प्रत्यय से बने शब्द कृदन्त होते हैं। वर्तमानकालिक, भविष्यत्कालिक, पूर्वकालिक, उत्तरकालिक भाववाच्य व कर्मवाच्य कृदन्तों का सम्यक बोध कराना।

पाठ्यचर्या संबंधी अपेक्षाएँ

संस्कृत शिक्षण को सुगम रोचक एवं बाल केन्द्रित बनाने के लिए अध्यापक यथा संभव संस्कृत माध्यम से संस्कृत शिक्षण करें। छात्रों के परिवेश एवं मातृभाषा ज्ञान का संस्कृत शिक्षण में नियोजित किया जाए।

  • इस स्तर पर संस्कृत शिक्षण को प्रभावी एवं रोचक बनाने हेतु अध्यापक छात्र केन्द्रित एवं क्रियाकलाप विधि को अपनायेगा। जिससे विद्यार्थियों में स्तरानुरूप भाषा- कौशलों वर्ण, वाचन, पठन एवं लेखन का विकास हो सके। अध्यापकों द्वारा यथा संभव भाषा के मौखिक व्यवहार द्वारा विद्यार्थियों में संस्कृत बोलने की प्रवृत्ति को विकसित करना अपेक्षित है।
  • अध्यापक संस्कृत के पद्यपाठों का सरवर पाठ करें तथा विद्यार्थियों द्वारा अनुकरण वाचन करावें।
  • अध्यापक संस्कृत के विशिष्ट ध्वनियों जैसे श, ष, स एवं संयुक्ताक्षर को आवश्यक रूप से पढ़कर बताएँ तथा विद्यार्थियों से वैसा ही करने को कहें।
  • निर्धारित व्याकरण पक्ष को सैद्धान्तिक रूप से पढ़ाकर प्रयोगिक रूप से ज्ञान करावें। ताकि उनके प्रयोग में विद्यार्थी दक्ष हो सकें।
  • यथा संभव संस्कृत माध्यम से आदेश निर्देशपरक वाक्यों का प्रयोग कर कराएँ।
  • कक्षा में मौखिक प्रश्नोत्तर पर बल दीजिए।
  • प्रत्येक छात्र को संस्कृत बोलने के लिए प्रोत्साहित कीजिए।
  • श्रवण एवं भाषण कौशल के विकास हेतु विविध क्रीडापरक गतिविधियों का आयोजन हो।

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

Leave A Reply