7 अगस्त आरक्षण दिवस स्पेशल : आरक्षण एक चिंतन

आरक्षण दिवस कब और क्यों मानते हैं?

आरक्षण दिवस हमें क्या संदेश देता है?

आरक्षण दिवस हमें यह संदेश देता है कि समाज की पिछड़ी जातियां सदियों से दीनता का दर्द सहती आई है। समाज ने पिछले जन्म के कर्मों का दुष्फल बताते हुए पिछड़ी जातियों को दबाया व कुचला।अब समय आ गया है कि आरक्षण के माध्यम से वे भी समाज के मुख्यधारा से जुड़ें।

आरक्षण के मापदंड ?

शैक्षिक संस्थानों और नौकरियों में सीटो में  कोटा पद्धति के आधार पर आरक्षण दिया जाता है। विशिष्ट समूह के सदस्यों के लिए सभी संभावित पदों को एक अनुपात में रखा  जाता है। जो निर्दिष्ट समुदाय के तहत नहीं आते हैं, वे केवल शेष पदों के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, जबकि निर्दिष्ट समुदाय के सदस्य सभी संबंधित पदों आरक्षित और सार्वजनिक दोनों  के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, रेलवे में जब 10 में से जब 2 कार्मिक पद सेवानिवृत सैनिकों, जो सेना में रह चुके हैं, के लिए आरक्षित होता है तब वे सामान्य श्रेणी के साथ ही साथ विशिष्ट कोटा दोनों ही श्रेणी में प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं।

इसके अतिरिक्त आरक्षण के मापदंडो में जातिगत आधार पर दी जाती है ,जैसा कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा विभिन्न अनुपात में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ी जातियों (मुख्यत: जन्मजात जाति के आधार पर) के लिए सीटें आरक्षित की जाती हैं। यह जाति जन्म के आधार पर निर्धारित होती है और कभी भी बदली नहीं जा सकती. जबकि कोई व्यक्ति अपना धर्म परिवर्तन कर सकता है और उसकी आर्थिक स्थिति में उतार -चढ़ाव हो सकता है, लेकिन जाति स्थायी होती है।
            आरक्षण के मापदंड में लिंग आधारित आरक्षण भी होता है.जैसा कि महिला आरक्षण महिलाओं को ग्राम पंचायत और नगर निगम चुनावों में 33% आरक्षण प्राप्त है। इसके अतिरिक्त, भारत में महिलाओं को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण या अधिमान्य व्यवहार मिलता है।

           आरक्षण धर्म आधारित भी होता है उदाहरण स्वरुप , केंद्र सरकार ने अनेक मुसलमान समुदायों को पिछड़े मुसलमानों में सूचीबद्ध कर रखा है, इससे वे आरक्षण के हकदार होते हैं।कभी कभी तो राज्य सरकार के अधीन सभी नौकरियां उस सरकार के तहत रहने वाले अधिवासियों के लिए आरक्षित होती हैं।

           इसके अतिरिक्त आरक्षण के अन्य मानदंड कुछ आरक्षण निम्नलिखित के लिए भी बने हैं:
स्वतंत्रता सेनानियों के बेटे/बेटियों/पोते/पोतियों के लिए।
शारीरिक रूप से विकलांग आदि .
          और तो और पूजा स्थलों (जैसे तिरूपति (बालाजी) मंदिर, तिरुथानी मुरुगन (बालाजी) मंदिर) में भुगतान मार्ग आरक्षण है। वरिष्ठ नागरिकों/पीएच (PH) के लिए सार्व‍जनिक बस परिवहन में सीट आरक्षण को भी हमने देखा है .

           इस प्रकार हम कह सकते है कि आरक्षण का मामला वृहद् है परन्तु आजकल आरक्षण पर चर्चा विभिन्न शासकीय सेवाक्षेत्रों में नियुक्ति  को लेकर एवं विविध शासकीय सेवाओं के लाभ को लेकर  एकांगी प्रतीत होती है . आरक्षण के पक्ष में वे लोग आते है जो इससे लाभ ले रहे है और इसके विपक्ष में वो लोग खड़े हो रहे हैं जिन्हें आरक्षण से नुकसान उठाना पड़ रहा है. आज आरक्षण सामाजिक सरोकार से ज्यादा आर्थिक स्तर बढ़ाने का माध्यम बनता जा रहा है जो सोचनीय है 

आरक्षण  क्यों जरुरी है ?

आरक्षण को समझने के लिए इसके इतिहास को समझना बेहद जरुरी है और यह भी जरुरी है कि आज भी क्या इसकी जरुरत है. वस्तुतः आरक्षण जाति से जुड़ा हुआ मसला है. सरकार की एक ओर मानसिकता आरक्षण को कमजोर करने की ओर दिखती है तो दूसरी ओर समाज से जातिवाद को पूरी तरह ख़तम करने में नाकाम साबित हो रही है . वोट बैंक की राजनीती को देखते हुए लगता है कि वह जातिवाद को हटाना कभी नहीं चाहेगी . और जब तक जाति रहेगी ,लोगो के बीच जातिगत भेदभाव बना रहेगा,जिसकी खबर हम आये दिन अखबार में देखने को मिल जाती है. और जब तक जातिगत भेदभाव बना रहेगा , तब तब आरक्षण की आवश्कता महसूस करती ही जाएगी. डॉ. भीमराव आंबेडकर भी स्वयं यह नहीं चाहते थे कि आरक्षण सदैव बनी रहे.  लेकिन जिस प्रासंगिकता में आरक्षण को अपनाई गयी थी. वह आज भी बहुत हद तक बनी हुयी है . कुछ वर्गों को यह बात समझ नही आती और इसे पक्षपात करने का साधन माना जा रहा है जबकि इसे पक्षपातपूर्ण व्यवहार को दूर करने के लिए अपनाया गया था.

         जनवरी 2019 एक तरफ सवर्ण जातियों को बिना मांगेआरक्षण देने का साक्षी है तो दूसरी तरफ दलितों, पिछड़ों एवं आदिवासियों को मिले आरक्षण को न्यायपालिका द्वारा छीने जाने का गवाह बना है। विधायिका, न्यायपालिका एवं कार्यपालिका के इस रवैये से स्पष्ट है कि भारत की राजसत्ता के तीनों अंगों में दलितों, पिछड़ों एवं आदिवासियों के अधिकारों के प्रति कोई प्रतिबद्धता नहीं है। इसके विपरीत सवर्ण जातियों कोअधिकार संपन्न बनाने के लिए तीनों अंग कृत संकल्पित हैं। 8 व9 जनवरी, 2019 को संसद के दोनों सदनों ने भारी बहुमत से सवर्ण जातियों के ‘आर्थिक रूप से कमजोर हिस्से’ के लिए सरकारी नौकरियों एवं शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश हेतु 10 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का ‘संविधान संशोधन बिल’ पासकिया। इसके द्वारा संविधान संशोधन, संविधान के भाग–तीन(मूल अधिकार) के अनुच्छेद 15 व 16 में 15 (6) एवं 16(6) को जोड़ा गया।

आरक्षण क्या अब खतरे में है

सवर्ण जातियों के तथाकथित गरीबों के लिए नौकरियों तथाशिक्षण संस्थाओं में 10 प्रतिशत आरक्षण देने के बिल पर जिस प्रकार की एकता संसद में, राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के बीच दिखाई दी, वह चौंकाने वाली है आज सरकार ‘जाति के आधार’ पर आरक्षण को समाप्त नहीं कर सकती है क्योंकि दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के अंदर आई राजनीतिक चेतना इसके मार्ग में बाधा बन रही है।इसलिए मौजूदा सरकार ने बड़ी ही चालाकी से सवर्ण जातियों को भी आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की चाल चली है। इससेआरक्षण का आधार सामाजिक व शैक्षणिक के साथ साथ आर्थिक भी हो जायेगा तथा सभी प्रकार के आरक्षण को सिर्फ आर्थिक आधार पर करने की बहस भी प्रारंभ हो जायेगी।इसकी शुरुआत ‘यूथ फॉर इक्विलिटी’ नामक संगठन द्वारासुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका से हो भी चुकी है।  इस संविधान संशोधन का सबसे खतरनाक पहलू यही है कि यह प्रावधान ‘आरक्षण’ की परंपरागत अवधारणा, जिसका विकास पिछले दो सौ वर्षोंमें सत्ता के सभी केन्द्रों पर ‘ब्राह्मण वर्चस्व’ के विरुद्ध हुआ था, को बदल देगा। आधुनिक भारत में दलितों, पिछड़ों के दो सौवर्षों के संघर्षों से प्राप्त उपलब्धियों पर पानी फेर देगा। इसलिए इसका विरोध करने वाले इसे संविधान के साथ धोखा तथा लोकतंत्र की हत्या तक भी कह रहे हैं।

आरक्षण की अवधारणा के विकास

आरक्षण की अवधारणा का विकास  आधुनिक भारत में राष्ट्रराज्य, लोकतंत्र, संवैधानिक शासन के विकास से जुड़ा हुआ है. 18वीं सदी में  अंग्रेजों के आगमन से पूर्व भारत में सामंती मूल्यों को मानने वाले राजाओं व नवाबों का राजसत्ता पर अधिपत्यथा। समाज–व्यवस्था धर्मशास्त्रों द्वारा संचालित थी। ईस्ट इंडियाकंपनी तथा ब्रिटिश क्राउन के अधीन राजसत्ता के हस्तांतरण केपश्चात भारत में यूरोपीय पुनर्जागरण के मूल्यों जैसे लोकतंत्र, मानव अधिकार, कानून का शासन, संविधान आदि की स्थापनाकी प्रक्रिया प्रारंभ हुई। यूरोपीय मूल्य, भारत में स्थापिततत्कालीन मूल्यों के विपरीत थे इसलिए भारतीय समाज में उच्चजातियों, जिनका समाज में वर्चस्व स्थापित कर उन्होंने व्यापक विरोध किया। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधीन राज्यों में 1813 में सभी स्त्री–पुरुषों को समान शिक्षा का कानून लागू हुआ। इसका विरोध सवर्ण जातियां विशेषकर ब्राह्मणों द्वारा किया गया। इस विरोध के कारण शूद्र और अतिशूद्र (अछूत) समुदायों के बच्चों, को शिक्षा के समान अधिकार के बावजूद, शिक्षा से वंचित रहजाते थे। इसी प्रकार कंपनी राज के अधीन प्रशासनिक नौकरियों में सभी जाति धर्म के व्यक्तियों को समान अवसर देने का कानून 1833 में बनाया गया जिसका ब्राह्मणों ने विरोध किया। यह विरोध इसलिए था कि ब्राह्मण धर्मग्रंथों के अनुसार केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण, जिसे द्विज या सवर्ण कहा जाता है, वही शिक्षा प्राप्त करने, शस्त्र धारण करने और संपत्तिअर्जित करने के अधिकारी हैं। महिलायें तथा शूद्र वर्ण के व्यक्ति शिक्षा प्राप्त करने, शस्त्र धारण करने एवं संपत्ति अर्जित करने के अधिकारी नहीं है। इसीलिए ब्राह्मण धर्म के संरक्षक द्विजवर्ण के लोग शूद्र, अतिशूद्र तथा महिलाओं की शिक्षा के विरोधीथे।इस प्रकार का विरोध ज्योतिबा फुले एवं उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले को भी झेलना पड़ा था। शूद्रों एवं अछूतों को शिक्षित करने के अपराध में स्वयं ज्योतिबा फुले के पिता ने दोनों पति–पत्नी को अपने घर से निकाल दिया था। ज्योतिबा फुले पर जानलेवा हमला हुआ था तथा सावित्रीबाई फुले के ऊपर गोबर व कीचड़ फेंकने तथा गुण्डे भेजकर डराने व धमकाने जैसे कृत्य ब्राह्मणों द्वारा कराये गये थे। इस विरोध केकारण ही 1884 तक एक भी तथाकथित अछूत स्नातक की कक्षा में प्रवेशनहीं पा सका था तथा 1894 तक एक भी तथाकथित अछूत सरकारी सेवा में अधिकारी नहीं बन पाया था।
                     बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में जब विधायिका में भारतीयोंको प्रतिनिधित्व देने की मांग जोर पकड़ने लगी तो डा. अंबेडकर ने अछूतों के लिए विधायिका में हिंदुओं से अलग जनसंख्या के अनुपात में अलग प्रतिनिधित्व के साथ–साथ विशेषाधिकार की मांग किया। 1932 में घोषित ‘कम्यूनलअवार्ड’ में बाबा साहब की मांग मान ली गयी। परिणामस्वरूप अछूतों को पृथक निर्वाचक मंडल के साथ–साथ दो मतों का अधिकार भी प्राप्त हुआ। लेकिन गांधी के प्रबल विरोध एवं आमरण अनशन के दबाव में डा. आंबेडकर को झुकना पड़ा तथा पूना पैक्ट हुआ जिसमें अछूतों को विधायिका में न केवलदो मतों का विशेषाधिकार छोड़ना पड़ा बल्कि हिन्दुओं के मतों पर आश्रित प्रतिनिधित्व स्वीकार करना पड़ा। यह प्रावधान संविधान में भी उसी रूप में रखा गया है। नौकरियों में आरक्षण तथा शिक्षा में विशेष संरक्षण का अधिकार सुरक्षित रहा जिसे संविधान में स्वीकार किया गया।
               इस प्रकार भारत के संविधान में, अनुसूचित जाति के रूप में अछूतों को तथा अनुसूचित जनजाति के रूप में आदिवासियों को 26 जनवरी 1950 से विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के साथ–साथ प्रशासनिक सेवाओं में जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व सैद्धांतिक रूप से स्वीकार कर लिया गया।                       

           लेकिन व्यवहार में देखें तो विधायिका के निम्न सदन लोकसभा तथा प्रदेशों की विधान सभाओं में तो आरक्षण लागू किया गया लेकिन विधायिका के उच्च सदन राज्य सभा तथा प्रदेशों की विधान परिषदों में आज तक आरक्षण लागू नहीं किया गया। इसी प्रकार कार्यपालिका तथा न्यायपालिका में भी लागू नहींकिया गया। पिछड़े वर्गों को प्रशासनिक सेवाओं में 1992 में तथा शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश में 2006 में आरक्षण दिया गया। इसलिए संविधान लागू होने के 70 वर्षों पश्चात आज भी प्रशासन में सवर्ण जातियों का वर्चस्व स्थापित है।
           आज भी भले ही ‘हम भारत के लोग’ इस शासन व्यवस्था को चला रहे हैं, लेकिन वास्तव में शासन और प्रशासन सवर्ण जातियों के कब्जे में है। इन परिस्थितियों में सवर्ण जातियों को 10 प्रतिशत का आरक्षण देना न केवल दलितों, पिछड़ों व आदिवासियों के हितों पर कुठाराघात है बल्कि कुछ लोगों ने  इसे लोकतंत्र की हत्या का नाम दे दिया  है।

क्या है आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था….

आज भारत मे  एक तरफ आरक्षण बचाने की मांग चल रही है तो दूसरी तरफ आरक्षण खत्म किया जा रहा है। 22 जनवरी2019 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। आरक्षण नीति के समर्थकों का कहना है कि परंपरागत रूप से चली आ रही जाति व्यवस्था में निचली जातियों के लिए घोर उत्पीड़न और अलगाव है और शिक्षा समेत उनकी विभिन्न तरह की आजादी अभी तक सीमित है. जो भी हो आरक्षण को लेकर हमारा देश दो वर्गों में बटता जा रहा है जो कि किसी भी सच्चे भारतीय के लिए उचित नहीं है.

आरक्षण पर स्लोगन

(प्रस्तुत लेख लेखक के निजी विचार है जिसे विभिन्न लेखो का अध्ययन कर लिखा गया है और विचारों में मतान्तर होना स्वाभाविक है.)

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