21 अक्टूबर आज़ाद हिन्द फ़ौज दिवस मनाने से पहले जानियें आज़ाद हिन्द फ़ौज के बारे में

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कदम कदम बढ़ाये जा

खुशी के गीत गाये जा

ये जिंदगी है क़ौम की

तू क़ौम पे लुटाये जा

तू शेर-ए-हिन्द आगे बढ़

मरने से तू कभी न डर

उड़ा के दुश्मनों का सर

जोश-ए-वतन बढ़ाये जा

कदम कदम बढ़ाये जा

खुशी के गीत गाये जा

ये जिंदगी है क़ौम की

तू क़ौम पे लुटाये जा

हिम्मत तेरी बढ़ती रहे

खुदा तेरी सुनता रहे

जो सामने तेरे खड़े

तू खाक में मिलाये जा

कदम कदम बढ़ाये जा

खुशी के गीत गाये जा

ये जिंदगी है क़ौम की

तू क़ौम पे लुटाये जा

चलो दिल्ली पुकार के

ग़म-ए-निशाँ संभाल के

लाल क़िले पे गाड़ के

लहराये जा लहराये जा

कदम कदम बढ़ाये जा

खुशी के गीत गाये जा

ये जिंदगी है क़ौम की

तू क़ौम पे लुटाये जा

इस गीत को आखिर कौन भारतीय भूल सकता है ? आजाद हिन्द फौज का इस प्रयाण गीत की रचना राम सिंह ठाकुर ने की थी। जिसे गाते हुये मन में उत्साह का संचार होने लगता है.

क्या आप जानते हैं कि :-

आज़ाद हिन्द फ़ौज की स्थापना कैसे हुई?

आज़ाद हिन्द फ़ौज का अपना क्या इतिहास रहा?

आज़ाद हिन्द फ़ौज सबसे पहले राजा महेन्द्र प्रताप सिंह ने 29 अक्टूबर 1915 को अफगानिस्तान में बनायी थी। मूलत: यह ‘आजाद हिन्द सरकार’ की सेना थी जो अंग्रेजों से लड़कर भारत को मुक्त कराने के लक्ष्य से ही बनायी गयी थी।

रासबिहारी बोस ने जापानियों के प्रभाव और सहायता से दक्षिण-पूर्वी एशिया से जापान द्वारा एकत्रित क़रीब 40,000 भारतीय स्त्री-पुरुषों की प्रशिक्षित सेना का गठन शुरू किया था और उसे भी यही नाम दिया अर्थात् आज़ाद हिन्द फ़ौज। बाद में उन्होंने नेताजी सुभाषचंद्र बोस को आज़ाद हिन्द फौज़ का सर्वोच्च कमाण्डर नियुक्त करके उनके हाथों में इसकी कमान सौंप दी।

तोयामा मित्सुरु, रासबिहारी बोस का स्वागत करते हुए ‘बृहद पूर्वी एशिया’ सम्मेलन के समय नेताजी (नवम्बर, १९४३) आजाद हिन्द फौज का एक सैनिक MG34 चलाते हुए द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सन 1942 में भारत को अंग्रेजों के कब्जे से स्वतन्त्र कराने के लिये आजाद हिन्द फौज या इन्डियन नेशनल आर्मी (INA) नामक सशस्त्र सेना का संगठन किया गया। इसकी संरचना रासबिहारी बोस ने जापान की सहायता से टोकियो में की।

आरम्भ में इस फौज़ में उन भारतीय सैनिकों को लिया गया था जो जापान द्वारा युद्धबन्दी बना लिये गये थे। बाद में इसमें बर्मा और मलाया में स्थित भारतीय स्वयंसेवक भी भर्ती किये गये। एक वर्ष बाद सुभाष चन्द्र बोस ने जापान पहुँचते ही जून 1943 में टोकियो रेडियो से घोषणा की कि अंग्रेजों से यह आशा करना बिल्कुल व्यर्थ है कि वे स्वयं अपना साम्राज्य छोड़ देंगे। हमें भारत के भीतर व बाहर से स्वतंत्रता के लिये स्वयं संघर्ष करना होगा। इससे गदगद होकर रासबिहारी बोस ने 4 जुलाई 1943 को 46 वर्षीय सुभाष को इसका नेतृत्व सौंप दिया। 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल के सामने ‘सुप्रीम कमाण्डर’ के रूप में सेना को सम्बोधित करते हुए “दिल्ली चलो!” का नारा दिया और जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश व कामनवेल्थ सेना से बर्मा सहित इम्फाल और कोहिमा में एक साथ जमकर मोर्चा लिया।

21 अक्टूबर 1943 के सुभाष बोस ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपीन्स, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता दे दी। और इसी दिन को फिर आज़ाद हिन्द फौज दिवस के रूप में मनाया जाता है.

जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दे दिये। सुभाष उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया। अंडमान का नया नाम शहीद द्वीप तथा निकोबार का स्वराज्य द्वीप रखा गया। 30 दिसम्बर 1943 को इन द्वीपों पर स्वतन्त्र भारत का ध्वज भी फहरा दिया गया। 4 फ़रवरी 1944 को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा भयंकर आक्रमण किया और कोहिमा, पलेल आदि कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त करा लिया।

6 जुलाई 1944 को उन्होंने रंगून रेडियो स्टेशन से गाँधी जी के नाम जारी एक प्रसारण में अपनी स्थिति स्पष्ट की और आज़ाद हिन्द फौज़ द्वारा लड़ी जा रही इस निर्णायक लड़ाई की जीत के लिये उनकी शुभकामनाएँ माँगीं।

21 मार्च 1944 को ‘चलो दिल्ली’ के नारे के साथ आज़ाद हिंद फौज का हिन्दुस्थान की धरती पर आगमन हुआ।

22 सितम्बर 1944 को शहीदी दिवस मनाते हुये सुभाष बोस ने अपने सैनिकों से मार्मिक शब्दों में कहा –

हमारी मातृभूमि स्वतन्त्रता की खोज में है। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा। यह स्वतन्त्रता की देवी की माँग है।

किन्तु दुर्भाग्यवश युद्ध का पासा पलट गया। जर्मनी ने हार मान ली और जापान को भी घुटने टेकने पड़े। ऐसे में सुभाष को टोकियो की ओर पलायन करना पड़ा और कहते हैं कि हवाई दुर्घटना में उनका निधन हो गया। यद्यपि उनका सैनिक अभियान असफल हो गया, किन्तु इस असफलता में भी उनकी जीत छिपी थी। सुभाष उग्र राष्ट्रवादी के तौर पे भारत को शीघ्रातिशीघ्र स्वतन्त्रता दिलाने हेतु हिंसात्मक उपायों में आस्था भी रखते थे। इसीलिये उन्होंने आजाद हिन्द फौज का गठन किया था।

आज़ाद हिन्द फौज़ के गुमनाम शहीदों की याद में सिंगापुर के एस्प्लेनेड पार्क में आईएनए वार मेमोरियल पर आज़ाद हिन्द फौज़ के तीन ध्येयवाचक शब्द – इत्तेफाक़ (एकता), एतमाद (विश्वास) और कुर्बानी (बलिदान) लिखे हुए हैं।

सन् 1995 में सिंगापुर की राष्ट्रीय धरोहर परिषद (नेशनल हैरिटेज बोर्ड) ने वहाँ निवास कर रहे भारतीय समुदाय के लोगों के आर्थिक सहयोग से इण्डियन नेशनल आर्मी की बेहद खूबसूरत स्मृति पट्टिका उसी ऐतिहासिक स्थल पर फिर से स्थापित कर दी। इसकी देखरेख का काम सिंगापुर की सरकार करती है।

आजाद हिन्द सरकार केवल नाम नहीं था बल्कि नेताजी के नेतृत्व में इस सरकार ने हर क्षेत्र में नई योजना बनाई थी। इस सरकार का अपना ध्वज था, अपना बैंक था, अपनी मुद्रा थी, अपना डाक टिकट था, अपनी गुप्तचर सेवा थी। नेताजी ने कम संसाधन में ऐसे शासक के विरुद्ध लोगों को एकजुट किया जिसका ‘सूरज नहीं ढलता था’।

21 अक्टूबर  आज़ाद हिन्द फौज दिवस के उपलक्ष्य पर हमें वीर सेनानी सुभाषचन्द्र बोस को याद करते हुए गर्व महसूस होता है.

जय हिन्द जय भारत

इन्कलाब जिंदाबाद

वन्दे मातरम

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