कक्षा पहली के बच्चों के लिए हिंदी में सीखने के प्रतिफल

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कक्षा पहली के बच्चों के लिए हिंदी में सीखने के प्रतिफल

  • विविध उद्देश्यों के लिए अपनी भाषा अथवा/और स्कूल की भाषा का इस्तेमाल करते हुए बातचीत करते हैं, जैसे- कविता, कहानी सुनाना, जानकारी के लिए प्रश्न पूछना, निजी अनुभवों को साझा करना।
  • सुनी सामग्री (कहानी, कविता आदि) के बारे में बातचीत करते हैं, अपनी राय देते हैं, प्रश्न पूछते हैं।
  • भाषा में निहित ध्वनियों और शब्दों के साथ खेलने का आनंद लेते हैं, जैसे- इनना, बिन्ना, तिन्‍ना।
  • प्रिंट (लिखा या छपा हुआ) और गैर-प्रिंट सामग्री (जैसे, चित्र या अन्य ग्राफ़िक्स) में अंतर करते हैं।
  • चित्र के सूक्ष्म और प्रत्यक्ष पहलुओं पर बारीक अवलोकन करते हैं।
  • चित्र में या क्रमवार सजाए चित्रों में घट रही अलग-अलग घटनाओं, गतिविधियों और पात्रों को एक संदर्भ या कहानी के सूत्र में देखकर समझते हैं और सराहना करते हैं।
  • पढ़ी कहानी, कविताओं आदि में लिपि चिह्लों/शब्दों/वाक्यों आदि को देखकर और उनकी ध्वनियों को सुनकर, समझकर उनकी पहचान करतते हैं।
  • संदर्भ की मदद से आस-पास मौजूद प्रिंट के अर्थ और उद्देश्य का अनुमान लगाते हैं, जैसे- टॉफ़ी के कबर पर लिखे नाम को *टॉफ़ी’, *लॉलीपॉप’ या *चौंकलेट’ बताना।
  • प्रिंट (लिखा या छपा हुआ) में मौजूद अक्षर, शब्द और वाक्य की इकाइयों को पहचानते हैं, जैसे- ‘मेरा नाम विमला है।’ बताओ, यह कहाँ लिखा हुआ है?/ इसमें *नाम’ कहाँ लिखा हुआ है?/ ‘नाम’ में में *म’ पर अँगुली रखो।
  • परिचित/अपरिचित लिखित सामग्री (जैसे- मिड-डे मील का चार्ट, अपना नाम, कक्षा का नाम, मनपसंद किताब का शीर्षक आदि) में रुचि दिखाते हैं, बातचीत करते हैं और अर्थ की खोज में विविध प्रकार की युक्तियों का इस्तेमाल करते हैं, जैसे- केवल चित्रों या चित्रों और प्रिंट की मदद से अनुमान लगाना, अक्षर-ध्वनि संबंध का इस्तेमाल करना, शब्दों को पहचानना, पूर्व अनुभवों और जानकारी का इस्तेमाल करते हुए अनुमान लगाना
  • हिंदी के वर्णमाला के अक्षरों की आकृति और ध्वनि को पहचानते हैं।
  • स्कूल के बाहर और स्कूल के भीतर (पुस्तक कोना/पुस्तकालय से) अपनी पसंद की किताबों को स्वयं चुनते हैं और पढ़ने की कोशिश करते हैं।
  • लिखना सीखने की प्रक्रिया के दौरान अपने विकासात्मक स्तर के अनुसार चित्रों, आड़ी-तिरछी रेखाओं (कीरम-काटे), अक्षर-आकृतियों, स्व-वर्तनी (इंनवेंटिड सपैलिंग) और स्व-नियंत्रित लेखन (कनरवैंशनल राइटिंग) के माध्यम से सुनी हुई और अपने मन की बातों को अपने तरीके से लिखने का प्रयास करते हैं।
  • स्वयं बनाए गए चित्रों के नाम लिखते (लेबलिंग) हैं, जैसे- हाथ के बने पंखे का चित्र बनाकर उसके नीचे “बीजना’ (ब्रजभाषा, जो कि बच्चे की घर की भाषा हो सकती है।) लिखना

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